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टीएमयू हॉस्पिटल के डेंटल डॉक्टर्स की टीम ने बिजनौर के किशोर की लौटाई मुस्कान

-तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर के ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग की टीम ने साढ़े तीन घंटे की सर्जरी में निकाला 97 ग्राम का ओडोन्टोमा

सामना संवाददाता / मुरादाबाद

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर के ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग ने 14 वर्षीय किशोर को फिर से मुस्कराने का मौका दिया है। मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के प्रो. डीएस गुप्ता और उनकी टीम ने करीब साढ़े तीन घंटे तक चली सर्जरी में मुंह के अंदर चीरा लगाकर 97 ग्राम का ओडोन्टोमा सफलतापूर्वक निकाला।
ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के सामने चेहरे की बनावट को सुरक्षित बनाए रखना तथा जबड़े की हड्डी और नसों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। डॉक्टरों का मानना है कि 97 ग्राम का ओडोन्टोमा होना बेहद दुर्लभ है। लगभग तीन प्रतिशत मामलों में ही इतना बड़ा ओडोन्टोमा होने की संभावना रहती है। अधिकतर मामलों में यह दांत के आकार का ही होता है। कभी-कभी इसकी संख्या एक से अधिक भी हो सकती है।
डेंटल कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल डॉ. अंकिता जैन ने बताया कि ओडोन्टोमा जबड़े के भीतर दांतों के इनेमल और डेंटिन से बनने वाली एक सामान्य, गैर-कैंसरयुक्त एवं ट्यूमर जैसी वृद्धि या विकृति है। इसका पता अक्सर तब चलता है, जब किसी व्यक्ति के स्थायी दांत समय पर मसूड़ों से बाहर नहीं निकल पाते। ऑपरेशन करने वाली टीम में प्रो. डीएस गुप्ता के साथ डॉ. सौभाग्य अग्रवाल, डॉ. एसडी राव, डॉ. शुभम मिश्रा आदि शामिल रहे।
डॉ. डीएस गुप्ता वर्ष 2008 से टीएमयू से जुड़े हैं। वह अब तक करीब 1000 सफल फेशियल ऑपरेशन कर चुके हैं। डॉ. गुप्ता का कहना है कि उनके कार्यकाल का यह सबसे चुनौतीपूर्ण मामला था।
बिजनौर जिले के रानी नांगल गांव निवासी समीर आलम को चार वर्षों से निचले जबड़े के दाईं ओर दांत न निकलने और भारीपन की शिकायत थी। दांत न होने के कारण उसे कठोर चीजें खाने में भी परेशानी होती थी। बीमारी से परेशान किशोर को परिजन आसपास के कई डेंटिस्ट के पास लेकर गए, लेकिन न तो उसे आराम मिला और न ही बीमारी का पता चल सका। अंत में परिजन समीर को टीएमयू डेंटल कॉलेज लेकर आए। यहां ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने सीटी स्कैन कराया। जांच में पता चला कि उसके निचले जबड़े में ओडोन्टोमा है। इसके बाद डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी। उनका कहना था कि यदि समय रहते ऑपरेशन नहीं किया जाता तो ओडोन्टोमा लगातार बढ़ता जाता, जिससे पूरा जबड़ा प्रभावित हो सकता था। भविष्य में कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता था।

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