प्रवृत्ति!

महकते पुष्पों से लदी वल्लरी
पहले से अधिक झुक जाए।
मीठे फलों के बोझ से वृक्ष की
डाली धरती तक झुक जाए।
पंछी तब तक दाना चुगते,
जब तक क्षुधा शांत हो जाए।
कल की कल देखेंगे,
खोल पंख गगन उड़ जाए।
पशु आखेट करता वन में,
पेट भरने की सीमा तक खाए।
शेष छोड़ सुस्ताने,
छाया में चला जाए।
मीन छोटी हो या बड़ी,
अपनी क्षमता भर ही खाती।
अपनी पीठ पर लाद,
कभी न ले जाती दिखती।
एक निर्धन की झोंपड़ी में
कुटुंब के साथ-साथ
अतिथि भी समा जाएं।
परंतु आलिशान महलनुमा घर में
माता-पिता के आने पर भी
अलग से बाहर वाला कमरा खोल दिया जाए।
मानव उदर तो नन्हा-सा है,
कभी न इसको भरते देखा।
कुआं भी इसमें समाता दिखता,
मौका अगर हाथ लग जाए।
अपने हिस्से की धूप लेकर भी
क्यों न मानव-मन अघाए?
अन्य किसी को अपने दर्प में
छाया में धकियाए।
लात मारकर हक पराए पर,
अपने कपूतों के लिए धन
संचय करता जाए।
लोभ-मोह की मानव प्रवृत्ति
अपने आपको ही करती कलंकित।

-बेला विरदी

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