हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ
प्रेरणा सामान्य क्षमता की वृद्धि करनेवाला असामान्य रसायन है। संभव है कि मस्तिष्क में डोपामाइन जैसा कोई रस इस प्रेरणा के लिए जिम्मेदार हो। प्रेरणा ध्येय निष्ठा के लिए प्रेरित करती है। उत्साह भरती है। स्वाभाविक आलस्य को भी निकट नहीं आने देती। प्रेरणा की शक्ति मूल कार्य में लगने वाली शक्ति की क्षमता को भी प्रभावित करती है। प्रेरित करनेवाले तत्व कई प्रकार के हो सकते हैं। वे मोटे तौर पर दो हैं। दो से अधिक भी हो सकते हैं। अच्छे कार्य के लिए उत्साहित करनेवाली प्रेरणा। किसी गलत कार्य के लिए उकसाना भी प्रेरणा कहा जा सकता है। महापुरुष प्रेरित करते हैं। स्वयं तपते हैं। समाज को उत्साहित करते हैं। भारतीय जीवन दृष्टि में प्रेरणा का महत्व है। कोई ई-रिक्शा चलाने वाला चालक भी उच्चतर परीक्षाओं में अच्छे अंक पाता है। वह प्रेरित करता है। कोई नदी में डूबते हुए व्यक्ति को अपनी जान पर खेल कर बचाता है। यह प्रेरणादायी है। कोई विपरीत परिस्थितियों में भी समाज के लिए उच्चतम काम करता है। वह प्रेरणादायी है।
भारतीय साहित्य और इतिहास ऐसी कथाओं से भरा पूरा है। सामान्यतया राष्ट्र जीवन के उद्देश्यों के लिए काम करनेवाले महानुभावों की कथाएं हम सबको प्रेरित करती हैं। उनके गीत गाये जाते हैं। चारों तरफ उनकी कीर्ति पैâलती है। वे यशस्वी होते हैं। वे इतिहास की सीमाओं को लांघकर समकालीनता का अतिक्रमण करते हैं। अमर हो जाते हैं। इतिहास उनका अनुसरण करता है। अपने अंत:स्थल में जगह देता है।
स्त्री अपने संपूर्ण वैभव में माता है। माता प्रकृति की आदि और अनादि अनुभूति है। इसके बावजूद दुनिया के अनेक देशों में मानव इतिहास के दीर्घकाल तक स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं रही। यूरोप में पुनर्जागरण (रेनेसां) के पहले लाखों महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता था, लेकिन भारत में महिलाओं की स्थिति इससे भिन्न रही है। यहां सामाजिक विकास के साथ-साथ पुरुष और स्त्री में समानता का अधिकार और सहकार रहा है। ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले तक विवाह संस्था का विकास हो चुका था। जान पड़ता है कि अनेक महिलाएं अपने पति का चुनाव स्वयं करती थीं। ऋग्वेद के दसवें मंडल में उल्लेख है कि, ‘जो महिला स्वयं पति का चुनाव करती है वह भद्र है।’ परिवार में स्त्री की स्थिति काफी सशक्त थी। ऋग्वेद के एक प्रसंग में नव वधू के लिए आशीर्वाद का उल्लेख है कि ‘वधू परिवार में अपने सास, ससुर, ननद आदि पर सम्राट की तरह रहे।’ अथर्ववेद के रचनाकाल तक स्त्री समानता का जबरदस्त विकास हो चुका था। अथर्ववेद के एक सुंदर मंत्र में पति पत्नी से कहता है, ‘मैं साम हूं। तू ऋक् है। मैं द्यावा हूं। तू पृथ्वी है।’ एक अन्य सुंदर मंत्र में कहते हैं, ‘तुम दोनों का भोजन और पानी पीने का स्थान एक हो।’ भारत में उत्तर वैदिक काल से ही स्त्री सम्मान के वातावरण का विकास हो चुका था। स्त्रियां युद्ध में भी हिस्सा लेती थीं।
ऋग्वेद के अनुसार, विश्पला नाम की महिला का पैर युद्ध में टूट गया था। वेदों की रचनाकार स्त्रियां भी थीं। ऋषि अगस्त्य से तर्क करनेवाली लोपामुद्रा ने भी मंत्र रचे थे। उपनिषदों में कहा गया है, ‘प्रारंभ में वह अकेला था। उस एक को अकेलेपन के कारण अच्छा नहीं लगा- तस्मात् एकाकी न रमते। उसने दूसरे की इच्छा की-स द्वितीयं ऐच्छत। उसने स्वयं को दो हिस्सों में बांट लिया। आधा पुरुष हुआ, आधा स्त्री। परम सत्ता को अर्धनारीश्वर कहा गया। रामकथा में वैâकई युद्ध भूमि में अपने पति राजा दशरथ के साथ गई थीं। युद्ध भूमि में ही उन्होंने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य मांगा था। गार्गी ने दार्शनिक याज्ञवल्क्य से अनेक प्रश्न पूछे थे। अंतिम प्रश्न पर महाज्ञानी याज्ञवल्क्य भी तिलमिला गए थे। महाभारत की द्रौपदी इतिहास और पुराण कथाओं में छाई हुई हैं।
भारतीय इतिहास महिलाओं के त्याग, शौर्य और पराक्रम से भरा पूरा है। अपने शौर्य और पराक्रम के लिए यश पानेवाली अनेक महिलाएं भी प्रेरित करती हैं। इसी परंपरा में मराठा साम्राज्य की प्रतिष्ठित महारानी और इतिहास प्रसिद्ध सूबेदार मल्हार राव होलकर के पुत्र खंडेराव की धर्मपत्नी अहिल्याबाई होलकर थीं। अल्पायु में ही उनका विवाह हो गया। वे २९ वर्ष की उम्र में ही विधवा हो गर्इं। होलकर ने अपने शासकीय क्षेत्र से बाहर भी देश के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए। जल संसाधन की चिंता की। कुओं और पेयजल की तमाम व्यवस्थाएं की। सड़क बनवाई। गरीबों के लिए नि:शुल्क अन्न क्षेत्र खोले। समाज के सभी क्षेत्रों में उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। उनके काम लोकमत की सराहना का विषय बने। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी उन्होंने कराया था और वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर का भी। महिलाओं की शिक्षा के लिए संस्थाएं खोलीं। समाज जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सन १७२५ में उनका जन्म हुआ था। मराठा हिंदू परिवार में चैंडी गांव में उनका जन्म हुआ था। खास बात है कि १८वीं सदी में भी उनके कार्य प्रेरक थे और भारतीय समाज का आज भी मार्गदर्शन करते हैं। उनके व्यक्तित्व में माता की ममता थी और पुरुष जैसा शौर्य पराक्रम। तत्कालीन समाज ने उन्हें आदर के साथ देखा। देखते ही देखते समाज के बड़े वर्ग ने उन्हें देवी जैसा सम्मान दिया। वे अखिल भारतीय स्तर पर सब जगह श्रद्धा का विषय बनी रहीं और अपने निधन (१३ अगस्त १७९५) के २२९ वर्ष बाद भी लोकप्रिय हैं। वे जीवित होतीं तो ३०० वर्ष की होतीं। लेकिन इससे क्या वे न होकर भी राष्ट्रीय आदर की पात्र हैं। समाज को प्रेरित करनेवाले ऐसे प्रतीक प्राय: कम ही मिलते हैं। आश्चर्य है इतिहास में उनके पद-प्रतिष्ठा के सापेक्ष उन्हें जगह नहीं मिली। ऐसे संगठन और कार्यकर्ता बधाई के पात्र हैं जो उनके स्मरण में श्रद्धापूर्वक अभियान चला रहे हैं।
लोक इतिहास से बड़ा होता है। इतिहास की संपदा की तुलना में लोक ज्यादा समृद्ध होता है। राजा हरिश्चंद्र को भी इतिहास में प्राय: जगह नहीं मिली। लेकिन लोक ने उन्हें अपनी स्मृति में संजोए रखा। सत्यनिष्ठा और राजा हरिश्चंद्र पर्यायवाची हैं। उनका स्मरण किया जाता है। ऐसे ही होलकर भी इतिहास की छोटी पोथियों से हटकर लोक हृदय सम्राट बनीं और जनसेवा की प्रतिष्ठा की प्रतीक भी। आदर्श स्त्री विमर्श चलते रहना चाहिए और इसके लिए हम सबको अतीत का अध्ययन करना चाहिए। ऐसी महिलाएं विरल हैं। इनमें अनेक पुराकथाओं जैसी दिव्य हो गई थीं। ऐसी इतिहास सिद्ध व प्रसिद्ध महिलाओं में होलकर का नाम अग्रणी है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम भी प्रतिष्ठा के साथ लिया जाता है। अतीत की प्रेरणा से आधुनिक को संवारने के लिए उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
