-राष्ट्रपति, विदेश मंत्री, स्पीकर सब किए गए साइडलाइन
-सत्ता के केंद्र में रहेंगे IRGC कमांडर
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पाकिस्तान में भले ही प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पद हैं, पर वहां चलती आर्मी चीफ की है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अब यह संक्रमण ईरान में भी पैâला दिया है। अमेरका और ईरान की मध्यस्थता के बहाने मुनीर तेहरान गए थे। मुनीर के तेहरान से लौटते ही अब वहां भी आईआरजीसी ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इस तरह अब ईरान में भी फौज की ही चलेगी।
ईरान से आनेवाली खबरों के अनुसार, वहां पर्दे के पीछे चल रही सत्ता की जंग अब खुलकर सामने आ गई है।
न्यूयॉर्क पोस्ट और अमेरिकी थिंक टैंक ‘इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान की कूटनीति और उसकी सैन्य मशीनरी पर अब पूरी तरह से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का कब्जा हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईआरजीसी कमांडर मेजर जनरल अहमद वाहिदी अब ईरान के सबसे ताकतवर शख्स बनकर उभरे हैं। उन्होंने न केवल देश के सैन्य तंत्र को अपने हाथ में ले लिया है, बल्कि अमेरिका के साथ होने वाली शांति वार्ताओं की डोर भी अब उनके और उनके करीबियों के हाथ में है। इस पूरी कवायद में ईरान के सर्वोच्च नेता मोज्तबा खामेनेई की मौन सहमति बताई जा रही है।
आईआरजीसी ने फैसला पलटा
इस पावर शिफ्ट का सबसे खतरनाक असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दिख रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस समुद्री रास्ते को खोलने पर सहमत होते दिख रहे थे, वहीं आईआरजीसी ने इस पैâसले को पलट दिया है।
एक्शन में ‘मॉस्किटो फ्लीट’
वाहिदी के आदेश पर ईरान की ‘फास्ट अटैक शिप्स’ ने इस सामरिक रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है। पिछले ४८ घंटों में ‘मॉस्किटो फ्लीट’ ने तीन जहाजों को निशाना बनाया है। इससे सैकड़ों जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं।
कूटनीति में बरती नरमी तो नेताओं को किया दरकिनार!
ईरान की सत्ता पर कट्टरपंथियों का कब्जा हो गया है। ये कट्टरपंथी कोई और नहीं ब्ग्ल्कि वहां की आईआरजीसी है। ये वहां की एक फौज है, जो सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है। हाल ही में ईरान का एक डेलिगेशन अमेरिका से वार्ता करने के लिए इस्लामाबाद गया था। हैरान करने वाली बात ये है कि ईरान के डेलिगेशन में शामिल कट्टरपंथी नेता मोहम्मद बागेर जोलगाद्र ने विदेश मंत्री अराघची की ही शिकायत कर दी। आरोप लगाया गया कि अराघची कूटनीति में ‘नरमी’ बरत रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि पूरी बातचीत टीम को वापस तेहरान बुला लिया गया। अब ईरान में नरमपंथियों की आवाज खामोश कर दी गई है।
वाशिंगटन के थिंक टैंक ‘इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर’ का मानना है कि इस बदलाव के बाद अब अमेरिका के साथ किसी भी सार्थक बातचीत की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है। मंगलवार की डेडलाइन सिर पर है और सीजफायर की डोर बेहद कमजोर है। ऐसे में ये आशंका फिर से बढ़ गई है कि अमेरिका और ईरान के बीच महायुद्ध का दूसरा हिस्सा फिर से शुरू हो सकता है। समुद्री ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, होर्मुज से आवाजाही पूरी तरह ठप हो चुकी है। केवल ईरानी जहाज ही इस मार्ग का इस्तेमाल कर रहे थे, हालांकि, वे भी अमेरिकी नाकाबंदी रेखा के करीब नहीं पहुंचे।
आईआरजीसी का दखल
रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान बातचीत में भी आईआरजीसी का दखल दिखा। मेजर जनरल वाहिदी ने बातचीत के लिए जाने वाली टीम में पूर्व मिलिट्री चीफ मोहम्मद जोलघाद्र को शामिल करने की कोशिश की थी, लेकिन प्रतिनिधिमंडल के नेताओं स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबफ और अराघची ने इसका विरोध किया था। इसका कारण ये था कि जोलघाद्र के पास कूटनीतिक अनुभव नहीं था।
अराघची ने सीमाएं लांघी
जोलघाद्र ने बाद में आईआरजीसी के वरिष्ठ नेताओं से शिकायत की थी कि बातचीत के दौरान अराघची ने अपनी सीमाएं लांघीं और ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ पर नरम रुख अपनाया। इसके बाद तेहरान के शीर्ष नेतृत्व ने बातचीत के लिए गई टीम को वापस बुला लिया।
