मुख्यपृष्ठधर्म विशेषस्वदेशी ही कर सकता है डॉलर का संहार

स्वदेशी ही कर सकता है डॉलर का संहार

शीतल अवस्थी

पिछले कुछ वर्षों से हिंदुस्थानी रुपया लगातार गिरता जा रहा है। डॉलर हिंदुस्थान को गुलाम बनाने पर आमादा है। महंगाई की आग में लगभग पूरी तरह से जल चुकी आम हिंदुस्थानी की तकदीर को डॉलर की डायन किसी हाल में संभलने नहीं देना चाहती। निश्चित तौर पर इसके लिए हमारे देश की सरकार, अर्थनीति और स्वार्थी व्यापारी वर्ग जिम्मेदार हैं पर वहीं दूसरी ओर इस तबाही के लिए बहुत हद तक हम खुद भी जिम्मेदार हैं। इसके लिए बस हमें स्वदेशी का ब्रह्मास्त्र उठाना होगा और विदेशी वस्तुओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों का संहार करना होगा।
यह छोटी सी बात आम हिंदुस्थानी भी समझता है कि रुपया लगातार कमजोर क्यों हो रहा है और डॉलर मजबूती पर वैâसे सवार है? अगर इंसान यह नहीं समझता तो शायद सोशल नेट वर्किंग मीडिया में इससे बचने की अपीलें लगातार पोस्ट नहीं होतीं। इन अपीलोें में आंकड़ों और तथ्यों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है पर उसका निचोड़ बिल्कुल सटीrक है। १९१७ में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत ३.०४ हिंदुस्थानी रुपए थी। यानी हमारी अर्थव्यवस्था गुलामी के उस दौर में भी खासी पुख्ता थी। यह सोचने को मजबूर करता है कि बाद के वर्षोेंं में ऐसा क्या हुआ कि हमारा रुपया लगातार डॉलर के डर से रोता चला गया। हम तो आजाद हो गए पर वह गुलाम होता चला गया। इसके लिए हमारे सत्ताधीश शत-प्रतिशत जिम्मेदार हैं पर हम खुद भी कम जिम्मेदार नहीं।
१९४७ आते आते एक अमेरिकी डॉलर की कीमत ३.३० हिंदुस्थानी रुपए हो गई। तब भी हालात बेकाबू नहीं थे। पर १९७० आते-आते एक डॉलर ७.५० हिंदुस्थानी रुपयों के साथ काफी मजबूत हो गया। जो वर्ष २००० में ४३ से ४४ हिंदुस्थानी रुपयों के बीच पहुंच गया था। वर्ष २०१४ में जब कांगे्रस ने सत्ता छोड़ी थी तब डॉलर की कीमत ५८ से ६० रुपयों के बीच झूल रहा था, जो करीब १२ वर्ष बाद आज ९२ से ९५ के बीच कारोबार कर रहा है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वर्ष के आखिर तक उसकी बोली १०० से कहीं आगे निकल जाए, क्योंकि सरकार के पास उसे काबू में करने का कोई उपाय नहीं है। समय समय पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ब्याज दरें बढ़ा कर उस पर काबू पाने का जुआ खेलता रहता है। भगवान जानें इससे डॉलर काबू में आएगा या नहीं, पर कर्ज महंगा होने से गरीब और मध्यम वर्ग का आम हिंदुस्थानी जरूर मारा जा रहा है। ऐसे में जब सरकार हीr उपाय नहीं जानती हो तो डॉलर को काबू करने का जिम्मा इस देश के १२५ करोड़ हिंदुस्थानियों को लेना होगा। डॉलर का संहार करना होगा और हथियार होगा स्वदेशी।
आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने स्वदेशी का अभियान छेड़ा था, आज फिर वह दौर आ गया है। आज फिर स्वदेशी का शस्त्र हमारी रक्षा करेगा। हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कोल्ड ड्रिंक्स का बहिष्कार करना होगा, उनके साबुन, दंत मंजन, खान-पान के पदार्थों ,जूता कपड़े, मोबाइल-घड़ियों समेत तमाम रोजमर्रा की वस्तुओं, विलासिता के साधनों को त्यागना होगा। वे सभी उत्पाद जो विदेशों से आते हैं या जिन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हिंदुस्थानी बाजार में उतार रखा है या उन कंपनियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हिस्सेदारी उनके उत्पादनों का पूर्णत: बहिष्कार करना जरूरी है। इस अभियान में यह विशेष तौर पर याद रखने की जरूरत है कि ‘मेड इन चाइना’ की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखना है।
आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा करने से होगा क्या? तो इसका सीधा सा जवाब है कि हर वह वस्तु जो विदेशी है या बहुराष्ट्रीय कंपनियों की है उसे खरीद कर हम हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं। हम आज के क्षणिक लाभ के चक्कर में अपने भविष्य व आने वाली कई पीढ़ियों को महंगाई, कर्ज और बेरोजगारी के दल-दल में धकेल रहे हैं। हम आज जितना फायदा नहीं कर पा रहे उससे कई गुना ज्यादा हम बेवजह कीमत चुका रहे हैं, क्योंकि ऐसी व्यापार व्यवस्था में जिसमें आयात पर निर्भरता हो, वह डॉलर को मजबूत करती है। हमें उन्हें भुगतान करने के लिए डॉलर खरीदना पड़ता है और जब डॉलर खरीदा जाता है तो रुपया अपने आप कमजोर होता जाता है। तो अब समय आ गया है कि हम संकल्प लेकर स्वदेशी का अभियान छेड़ें अ‍ैर स्वदेशी के ब्रह्मास्त्र से डॉलर का संहार करें। देखिएगा कुछ ही दिनों में डॉलर रुपए के सामने बौना होता चला जाएगा और हमारा देश खुशहाली की ओर अग्रसर हो जाएगा।

अन्य समाचार