संजय राऊत
२०१४ के बाद के कालखंड को भारतीय लोकतंत्र को मटियामेट करने वाले दशक के रूप में देखा जाना चाहिए। २०१४ के बाद भारतीय राजनीति में वोट खरीदने, जादू-टोना, मंत्र-तंत्र, पार्टी खरीदने का बोलबाला हो गया। लोकतंत्र से ‘सदसद्विवेक बुद्धि’ यह शब्द ही गायब हो गया। इस सप्ताह एक दिलचस्प तस्वीर प्रकाशित हुई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बैठे हैं और उनके बाएं और दाएं तरफ अजीत पवार, अशोक चव्हाण, एकनाथ शिंदे, प्रफुल्ल पटेल, मुश्रीफ, सरनाईक, भुजबल जैसे ‘चेहरे’ थे। मजेदार बात यह है कि इन सभी को भ्रष्टाचार के आरोप में श्री. फडणवीस और उनकी पार्टी चक्की पीसने जेल भेजने वाली थी। हालांकि, हकीकत में उन्होंने इनमें से कई लोगों पर कार्रवाई करके दहशत निर्माण किया और आज ये सभी लोग फडणवीस के मंत्रिमंडल में आनंद में जी रहे हैं। इनमें से कई लोग भाजपा में शामिल हो गए। अमित शाह ने खुद अशोक चव्हाण के घर अपने पैर की धूल झाड़ी और आमरस-पुरी की मेहमाननवाजी की। भाजपा अपने वचन, वादे या नैतिकता पर चलने वाली पार्टी नहीं है। ये सब हवा के रुख से मुंह मोड़ने वाले लोग हैं। भाजपा के एक सांसद निशिकांत दुबे लगातार मुसलमानों को गाली देते हैं। हिंदू-मुसलमान के बीच तनाव हो, ऐसे बयान वे संसद के अंदर और बाहर देते हैं। यही दुबे महाशय अब सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ सऊदी अरब और कुवैत जैसे इस्लामी देशों में गए हैं और वहां जाकर मुसलमान और इस्लाम का गुणगान किया है। ‘‘भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई भेद नहीं है। अल्पसंख्यक वगैरह कोई मुद्दा नहीं है। हम सब एक हैं। हम मुसलमानों के साथ खड़े हैं,’’ ऐसी मैसूरपाक बातें दुबे के मुंह से इस्लामी राष्ट्र में बाहर निकली हैं। यह सुविधा, अवसरवाद और कायरता है। भारत में जहर उगलना और इस्लामी देशों में जाकर ‘भारत धर्मनिरपेक्ष’ है, ऐसा कहना भाजपा के सभी दुबे जैसे लोगों का चरित्र है।
‘नकली’ राजनीति
प्रधानमंत्री मोदी की सारी राजनीति ‘नकली’ है। इसलिए उनके इर्द-गिर्द ‘नकली’ लोगों का जमावड़ा है। जब पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हुआ, तब उस युद्ध की कार्रवाई की जानकारी देने के लिए मोदी सरकार ने सोफिया कुरैशी को चुना था। ये दुनिया को यह दिखाने का उनका प्रयास था कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं। मोदी ने प्रे. ट्रंप के आदेश पर युद्धविराम की घोषणा करके देश की नाक कटवा दी, लेकिन फिर भी जीत का जश्न मनाया। मोदी ‘युद्ध’ उत्सव मनाने के लिए गुजरात गए। उस उत्सव में शामिल होने के लिए सोफिया कुरैशी और उनके रिश्तेदारों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया और उस कुरैशी परिवार के हाथों मोदी पर फूल बरसवाए गए। मुसलमान चोर, देशद्रोही और मंगलसूत्र चोर हैं, यह चुनाव प्रचार में मोदी की भूमिका थी, लेकिन भारतीय सेना की कैप्टन कुरैशी को भाजपा वोट की राजनीति के लिए और दुनिया के सामने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने के लिए चाहिए। इस ढोंग के खिलाफ कोई नहीं बोलेगा। जो बोलेगा उसे देशद्रोही माना जाएगा।
कैसा शंखनाद?
भाजपा के राज में संस्कृति, परंपरा और नैतिक मूल्यों का किस तरह हनन हुआ है, इसकी खबरें हर दिन प्रकाशित होती हैं। गंगा-यमुना में जितना प्रदूषण और कचरा है, उससे कहीं ज्यादा प्रदूषण भाजपा और उसके समर्थकों के विचारों में है। व्यक्तिगत स्तर पर जो हिंदू हैं, उन्हें धार्मिक कार्यों, शंखनाद, पूजा-अनुष्ठआन, घंटा बजाने जैसे कार्यों में भाजपा ने लगा दिया है और इसके लिए कई उपसंस्थाएं भी बनाई गई हैं। जो भाजपा परिवार में ‘नवहिंदू’ के रूप में शामिल हुए हैं, वे उनसे भी आगे हैं, वे अघोरी कार्य का मतलब ही हिंदुत्व है, ऐसा मानकर आगे निकल गए हैं। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के विज्ञानवादी हिंदुत्व के राजनीतिक विचारों ने उन्हें छुआ है, ऐसा नहीं दिखता। भारत में मानो जैसे धार्मिक खिचड़ी ही बन गई है। यह खिचड़ी आज सभी को पसंद आ रही है। हम सभी अभी ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां धर्म को विकृत किया जा रहा है। पंद्रह दिन पहले एकनाथ शिंदे और उनके साथ शिवसेना से अलग हुए लोगों की कर्मभूमि यानी गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में था। मैं नास्तिक नहीं हूं, लेकिन मैं ऐसे संप्रदाय से ताल्लुक रखता हूं जो मानता है कि धर्म का, व्रतवैकल्यों का अति आडंबर करना हिंदू धर्म नहीं है। उस दिन रविवार था और अमावस्या थी। कामाख्या मंदिर और परिसर भारी भीड़ से पटा हुआ था। सूखे हुए खून के जैसी बदबू इलाके में फैली हुई थी। दर्शन के लिए आए भक्तों के पास बतख, बकरी और दूसरे जानवर थे। वे इन्हें देवी को बलि चढ़ाने के लिए लाए थे, ये स्पष्ट नजर आया। मंदिर में प्रवेश करने के लिए भारी मशक्कत चल रही थी। मंदिर का गर्भगृह गहरा और रहस्यमयी है। मूर्ति का दर्शन करने के बाद जब मैंने बार्इं ओर गहरी जमीन पर देखा तो मुझे बेचैनी महसूस हुई। जमीन पर भैंसों और बैलों की ताजा गर्दनें कतार में रखी हुई थीं और उनके सामने ‘यजमान’ को बिठाकर ‘पंडा’ मंडली अनुष्ठान कर रही थी। मंदिर के पीछे ताजा बलि दी गई और उसे मंदिर में लाया गया। अपनी कामनाओं को पूरा करने और दुश्मन का कांटा निकालने के लिए इस मंदिर में ये ‘बलि अनुष्ठान’ किए जाते हैं और ये सब हिंदू धर्म के नाम पर चलाया जाता है। महाराष्ट्र में पिछले दल-बदल के दौरान यह मंदिर और भैंसे की बलि प्रसिद्ध हुआ और उसकी याद गर्भगृह में मौजूद ‘पंडा’ लोगों ने मुझे दिलाई।
‘‘हम आपको जानते हैं। आप महाराष्ट्र के पॉलिटिशियन हैं’’ ऐसा उन्होंने मुझसे कहा।
साढ़े तीन साल पहले इस गर्भगृह और मंदिर परिसर में वास्तव में क्या हुआ था, यह उनमें से एक ‘पंडा’ ने खुद बताना शुरू किया।
‘‘वो शिवसेना के लोगों ने यहां आकर बहुत अनुष्ठान पूजा की। पंडा लोगों को भारी दक्षिणा भी दिया।’’ पंडा।
‘‘कितने लोग थे।’’ मैं।
‘‘वो एक साथ पचास-साठ लोग आए थे।’’ पंडा।
‘‘कौन सी पूजा की?’’ मैं।
‘‘यहां जो होता है, सब पूजा की। बलि भी चढ़ाया देवी को।’’ पंडा।
‘‘कौन सा बलि दिया।’’ मैं।
‘‘भैंसा को काटा। कुछ लोगों ने बतख को भी काटा। शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए सभी ने बलि चढ़ाया।’’ पंडा।
पंडा ने बताया, लगभग सभी लोगों ने भैंसे और अन्य जानवरों की बलि चढ़ाई। उनमें से १८ लोगों ने बलि च़ढ़े जानवरों की सींगें काटकर अपने साथ ले गए। इन सींगों को ‘सिंदूर’ लगाकर जादू-टोना किए जाते हैं और वांछित स्थान पर गहराई में गाड़कर मनोकामना की पूजा की जाती है। इसके लिए इसी मंदिर के पंडों को बुलाया जाता है। इन सींगों को मुंबई-महाराष्ट्र लाया गया। उन सभी जादू-मंतर की गई सींगों को किसने कहां दफनाया, ये एक रहस्य ही है। शिंदे के समय में इन सींगों को ‘वर्षा’ बंगले के पिछले हिस्से में दफनाया गया, ऐसा जब मैंने लिखा तो हलचल मच गई। मुख्यमंत्री फडणवीस दफन सींगों के डर से ‘वर्षा’ बंगले में रहने नहीं जा रहे हैं, यह जानकारी पक्की थी। आज फडणवीस ‘वर्षा’ गए और उससे पहले लोक निर्माण विभाग के द्वारा ‘वर्षा’ परिसर की खुली जमीन की स्कैनिंग करवाई। क्या इस खोज अभियान में वहां दफन भैंसे की सींगें मिलीं? यह पहला सवाल है और श्री. फडणवीस क्या पूरी तरह से संतुष्ट हैं? यह दूसरा सवाल है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़नेवाला यह प्रगतिशील महाराष्ट्र है। संत गाडगे बाबा से लेकर प्रबोधनकार ठाकरे तक कई लोगों ने ये लड़ाई लड़ी। नरेंद्र दाभोलकर को तो इसके लिए बलिदान देना पड़ा। उस महाराष्ट्र में आखिरकार अंधभक्ति और अंधविश्वास के अंकुर फूट ही गए और ये सारे अंधविश्वासी लोग महाराष्ट्र सरकार में हैं और उन्होंने जनता को भी कर्मकांड में शामिल कर लिया है।
संत गाडगेबाबा ने मूर्ति पूजा, कर्मकांड और बलि प्रथा के खिलाफ अपना जीवन समर्पित कर दिया, फिर भी हिंदू धर्म में और शक्तिपीठ माने जाने वाले हमारे मंदिरों में यह सब हो रहा है। एकनाथ शिंदे और उनके लोगों ने महाराष्ट्र में कामाख्या मंदिर को प्रसिद्ध कर दिया। उसके बाद महाराष्ट्र से लोगों का प्रवाह इस मंदिर की ओर बढ़ गया और वे बलि चढ़ाने के लिए कतारों में खड़े होने लगे। मैंने मंदिर परिसर में ठाणे क्षेत्र के कम से कम सौ लोगों को देखा। प्रगतिशील महाराष्ट्र का यह मार्ग कठिन है। क्योंकि जादू-टोना और शंखनाद ही यहां सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान बन गया है।
एक बिल्ली भी राजा को ढीठ नजरों से देख सकती है, लेकिन महाराष्ट्र में खुद को ‘बाघ’ मानने वालों की अवस्था बकरी की तरह हो गई है और वे तानाशाहों की शरण में चले गए हैं। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य और दुश्मन पर जीत हासिल करने के लिए जादू-टोना और अघोरी तकनीकों का सहारा लिया। शिंदे गुट के अधिकांश लोग इस ‘अघोरी’ मार्ग पर चल पड़े हैं और ऐसे लोगों को नियुक्त किया है जो मासिक वेतन पर ऐसे अनुष्ठान करते हैं और कुंडलियां देखते हैं, ऐसी जानकारी जब उनमें से एक विधायक ने दी तब प्रगतिशील महाराष्ट्र का भविष्य वास्तव में क्या है? इस चिंता ने मुझे बेचैन कर दिया। डरपोक आदमी आखिरकार अंधविश्वास की राह पर चला जाता है। उन सभी के लिए मैं राल्फ इमर्सन का एक उद्धरण देता हूं और विषय को समाप्त करता हूं। इमर्सन कहते हैं, ‘‘जिन लोगों में आत्मविश्वास होता है वे किसी भी विपत्ति पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो व्यक्ति हर दिन कम से कम एक डर पर विजय प्राप्त नहीं कर पाता, उसे जीवन ने कुछ नहीं सिखाया, ऐसा ही कहना चाहिए।’’
