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एक बच्चे की एजुकेशन  सिस्टम को बदलने की जिद…

मनमोहन सिंह

खिड़की के बाहर लद्दाख की बर्फीली हवाएं सांय-सांय कर रही थीं। मिट्टी के एक छोटे से कमरे में केरोसिन की डिबरी (मिट्टी के तेल के दीये) की पीली रोशनी में एक १९ साल का लड़का बैठा था। तेल की तीखी गंध और दीये के काले धुएं से उसकी आंखें जल रही थीं, लेकिन उसका ध्यान सामने बिखरे कागजों पर था। यह १९८० का दशक था। उस लड़के ने अभी-अभी सरकारी स्कूल के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। जब उसने देखा कि मैट्रिक की परीक्षा में लद्दाख के ९५ प्रतिशत बच्चे फेल हो जाते हैं, तो उसका दिल दहल गया।
सोनम ने खाई थी तोता-रटंत शिक्षा प्रणाली को बदलने की कसम
यह कोई सामान्य नाकामी नहीं थी, यह एक पूरी पीढ़ी के सपनों की हत्या थी। बच्चे लद्दाखी बोलते थे, पाठ्यपुस्तकें दिल्ली से आती थीं, जिनमें `जहाज’ और `नारियल के पेड़ों’ की कहानियां थीं, ऐसी चीजें जो लद्दाख के बच्चों ने कभी देखी ही नहीं थीं। इस तोता-रटंत शिक्षा प्रणाली ने बच्चों की मौलिकता को खत्म कर दिया था। उस धुएं से भरे कमरे में बैठे लड़के ने कसम खाई कि वह बच्चों को रट्टू तोता बनाने वाली इस व्यवस्था को बदलकर रहेगा। वह लड़का था सोनम वांगचुक, जिसने खुद ९ साल की उम्र तक किसी स्कूल का चेहरा तक नहीं देखा था और प्रकृति की गोद में अपनी मां से बुनियादी सीख ली थी।
१९८८ में की सेकमोल की शुरुआत
इसीलिए सोनम बच्चों के दर्द को सबसे बेहतर समझते हैं। उन्होंने १९८८ में (सेकमोल) की शुरुआत की, जहां किताबों को रटने के बजाय व्यावहारिक ज्ञान और जीवन जीना सिखाया गया। लद्दाख की पारंपरिक धूप और मिट्टी की वास्तुकला से उन्होंने एक ऐसा सोलर वैंâपस तैयार किया, जो शून्य से ३० डिग्री नीचे की ठंड में भी बिना किसी हीटर के अंदर से गर्म रहता है। जब लद्दाख में पानी की किल्लत हुई, तो उन्होंने `आइस स्टूपा’ (बर्फ के स्तूप) बनाकर सूखी वादियों को जीवनदान दिया। लेकिन बच्चों के भविष्य को बचाने की सोनम की यह जंग सिर्फ लद्दाख की वादियों तक सीमित नहीं रही। जब देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी नीट परीक्षा में भारी गड़बड़ी और धांधली सामने आई, तो बच्चों के दर्द से वाकिफ सोनम वांगचुक का दिल एक बार फिर रो पड़ा। वे जानते हैं कि यह युवा पीढ़ी ही इस देश का असली भविष्य है और अगर इनके सपनों के साथ खिलवाड़ हुआ, तो पूरा देश अंधकार में चला जाएगा।
बच्चों के हक के लिए वांगचुक ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाया
इस परीक्षा धांधली के खिलाफ और इसके जिम्मेदार देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर सोनम वांगचुक २० दिनों से आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने बच्चों के हक के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया। कड़ाके की धूप और ढलती उम्र के बीच, २० दिनों तक अन्न का एक दाना न लेने के कारण उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया, जिसके बाद प्रशासन द्वारा कल उन्हें जबरदस्ती अस्पताल ले जाया गया।
डिबरी की मद्धम रोशनी से शुरू हुआ एक बच्चे का सफर आज देश के लाखों बच्चों के हक की सबसे बुलंद आवाज बन चुका है। सोनम वांगचुक अस्पताल के बिस्तर पर भी देश के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जब तक शिक्षा में रटंत विद्या और सिस्टम में भ्रष्टाचार रहेगा, तब तक देश का कोई बच्चा सुरक्षित नहीं है।

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