मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : लिट्टी-चोखा अउर झूलन ममा

काहें बिसरा गांव : लिट्टी-चोखा अउर झूलन ममा

पंकज तिवारी

धूप तेज थी, बहुत तेज। खेतों से लोग अपने-अपने घर आराम करने चले गए थे, फिर शाम को लौटने के गरज से पर झूलन और मगन अब भी लगे हुए थे। मगन भी चाहते थे कि घर चलके कुछ देर आराम करके फिर अच्छे मन से आकर बाकी का बोझ बान्हा जाए पर झूलन तो जैसे अखिरिया से गए थे कि ना बाबा ना… बिना पूरा बान्हे मैं यहां से जानेवाला नहीं। तल-तल-तल पसीने से कपड़ा भीगा पड़ा था, चेहरा तवे पर तपा बिल्कुल लाल टमाटर, पर जज्बा था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था और दोनों निरंतर अपने काम में लगे हुए थे। करीब डेढ़ घंटे बाद भांजा मुकेश घर से लौटा, साथ में भीगा चना-मटर, खांड़ से बना रस और रस में मिला माठा लेकर आया था। थक चुके दोनों लोगों के चेहरे पर चमक आ गई। आराम से चदरा बिछाकर वहीं बैठ गए, ‘अउर हो सार राम… सुनावऽ का हालचाल बाऽ घरे कऽ, सब खैरियत?’- मगन पूछते हुए दाना-पानी करने लगे। ‘हां-हां सब बढ़िया बाऽ बस सरहज तोहार परेशान बाऽ कि ओकरे ननद के लियाइ के कहिया आवथयऽ…?’
‘हां यार कहत त सहियइ हयऽ, बहुत दिन होइ गवाऽ ओनका नइहरे अउर हमइ ससुरारी गएऽ। रहऽ अब यंह दांइ जरूर लियाइ के आइथऽ।’ छाया दूर-दूर तक नहीं थी पर दोनों के बीच बातों की शीतलता का असर इतना था कि धूप को हार मानना पड़े। मुकेश भी वहीं बैठा दोनों को सुन रहा था। अब उसे भी खेती करने में मजा आने लगा था। आनंद वाकई है खेती में, अपनी माटी माई होती है, हल-बैल के साथ का तो जवाब ही नहीं पर अब कहां रह गया वो दिन। ताल में वैसे भी पेड़ कौन लगाता था। हां, गांव और ताल के बीच जो बड़ा वाला तारा था वहां खूब बड़े-बड़े और गझिन पौधे थे, जोरदार छाया थी, वहां बच्चे हमेशा खेलते हुए मिल जाते थे। लाठी लिए टेकते हुए ददा लोग भी आ जाते थे। गपशप का बाजार हमेशा गरम रहता था तो कुछ लोग वहीं बैठे लूडो और तास जैसे खेल भी खेला करते थे। पत्थर मार कर आम तोड़ने के बाद नमक-मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाने का अपना अलग ही मजा था। सूखी लकड़ियां जलाकर, आम भून लेने के बाद कभी-कभी खट्टा पना भी बनता था और सभी लोग खूब छककर पीते थे। उधर काम में मगन, मगन को दाना-रस करने के लिए उतना दूर जाना अच्छा नहीं लगा था। समय के साथ धूप उतरने लगी थी और लोग अपने खेतों में पुन: लौटने लगे थे और बोझ बांधने या गेहूं काटने लगे थे। अब तक झूलन लगभग अपने काम को समेटने की तरफ बढ़ चुके थे। चारों तरफ चहलकदमी बढ़ने के साथ ही इनके सभी बोझ बन्ह गए थे। अब जबकि लोग फिर से अपने कामों में लग रहे थे ये तीनों खुशी-खुशी घर को लौट रहे थे। रास्ते में सभी से पैलगी-असीस का उपक्रम चलता रहा। दुआरे मगन को देखते ही भैंस बड़ी जोर से चोकरी, बेचारे उधर ही घूम पड़े, देखे तो हउदा में दाना-पानी भरा पड़ा था। खड़े होकर भैंस का माथा सहलाने लगे मगन। भैंस अब बिल्कुल शांत आराम से खाने लगी थी, जबकि अचानक से हुए इस आवाज को सुनकर मगन बहू अंगना में से भागी चली आई थी। मगन और भैंस के इस स्नेह को देखकर भावुक हो उठे बहन और भाई दोनों। ‘लागत बा कि भंइसिया बहुत मानथऽ तोहंइ जीजा’, झूलन बोले। ‘हां मानथऽ त हबइ।’ बहिन दौड़कर चूल्हा पर चाय रख आई, जबकि तब चाय पीने का चलन नहीं था पर घर में मेहमान के आने के बाद चाय जरूर बनती थी। घर में मेहमान आने के बाद बच्चे खूब खुश होते थे कि इसी बहाने अच्छा-अच्छा खाने-पीने को मिलेगा। मगन के बाबू-माई अब नहीं थे बच्चों में भी अकेला मुकेश ही था। बड़ा शांत सा माहौल रहता था हमेशा पर आज ममा के आने के बाद रौनक बढ़ गई थी। खानदान में चार घर थे सभी घरों में खूब उठना-बैठना था ममा का। दुआरे ममा को देखते ही चारों घरों के बच्चे इकट्ठे हो गए थे। ‘गदेलउ तूं सब उपरी-उपरी क जुगाड़ करज्जा त आज अहरा लगवाइ दिहा जाइ अउर लिट्टी-चोखा बनवाइ दिहा जाइ, चारिउ घरे क खाना आज साथेनि बनै।’ बच्चे इतने खुश हो गए कि ममा के आसपास तितलियों से मंडराने लगे थे और दौड़-दौड़ कर काम किए जा रहे थे।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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