अहंकार के कीचड़ में रथचक्र! एक सरकार बनेगी क्या?

कलियुग ही झूठा है। सपने में दिया गया वचन पूरा करने के लिए राजा हरिश्चंद्र ने राजपाट छोड़ दिया। पिता द्वारा सौतेली मां को दिए गए वचन के कारण श्रीराम ने राज छोड़कर वनवास स्वीकार कर लिया। उसी हिंदुस्थान में दिए गए वचन से विमुख होने का ‘कार्य’ भारतीय जनता पार्टी ने पूरा कर दिया। ये सब एक मुख्यमंत्री पद के कारण हो रहा है तथा राज्य में सरकार बनाने की प्रक्रिया अधर में लटकी है। उद्धव ठाकरे ने ३१ तारीख को दोपहर में स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘मुख्यमंत्री पद का अमरपट्टा लेकर आया हूं, ऐसा कोई न समझे।’ उनका यह विधान जिनकी समझ में आ गया, उन्हें आगे की रामायण का भान रखना चाहिए। मैं ही दोबारा मुख्यमंत्री बनूंगा, ऐसा देवेंद्र फडणवीस कहते हैं। देवेंद्र दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे, ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा। फिर भी रथ के पहिए फंस गए हैं तथा भाजपा के संकटमोचक कृष्ण अमित शाह रथ के उद्धार के लिए अब तक आगे नहीं आए हैं, यह रहस्य है। महाराष्ट्र की राजनीति विधानसभा चुनाव के बाद दुविधाजनक अवस्था में है। दिल्ली की तरह महाराष्ट्र की राजनीति भी एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमनेवाले बाकी सब शोभायात्रा, आवश्यकतानुसार तथा जरूरत के अनुरूप बोलने के लिए इस तरह की हो जाने से राजनैतिक चर्चा खत्म हो गई। ऐसे समय में राजनीतिक चर्चा नहीं होती है तथा साथ मिलकर चुनाव लड़नेवाली दो पार्टियों को सरकार बनाने का जनादेश मिलने के बाद भी रथ के पहिए कीचड़ में फंस जाते हैं।
‘रिकॉर्ड’ के बावजूद पलटी
महाराष्ट्र का चुनाव परिणाम स्पष्ट है। भारतीय जनता पार्टी को १०५ सीटें मिलीं। शिवसेना साथ नहीं होती तो यह आंकड़ा ७५ के पार नहीं गया होता। ‘युति’ थी इसलिए गति मिली। ‘युति’ थी तब इसे कितनी सीटें मिली इसकी बजाय चुनाव से पहले ‘युति’ करते समय क्या करार हुआ था, वो महत्वपूर्ण है। शिवसेना को ५६ सीटें मिलीं लेकिन श्री फडणवीस पहले निर्धारित शर्तों के अनुरूप शिवसेना को ढाई साल मुख्यमंत्री पद देने को तैयार नहीं हैं। पदों का समान बंटवारा ऐसा रिकॉर्ड पर बोले जाने का सबूत होने के बावजूद भाजपा के देवेंद्र फडणवीस पलटी मारते हैं तथा पुलिस, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग की मदद से सरकार बनाने के लिए हाथ की सफाई दिखा रहे हैं। ये लोकतंत्र का कौन-सा उदाहरण है? इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया उस दिन को काला दिन कहकर संबोधित करनेवाले ऐसे क्यों बन गए हैं। इस पर हैरानी होती है। २४ तारीख को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद उसी दिन मुख्यमंत्री फडणवीस को बड़े अभिमान से ‘मातोश्री’ में जाकर पहले चर्चा शुरू करनी चाहिए थी। वातावरण तनावपूर्ण नहीं हुआ होता लेकिन १०५ कमलों का हार मतलब अमरपट्टा कौन इसे छीनेगा? वर्ष २०१४ की तरह शिवसेना तमाम शर्तें मान लेगी, सभी इस भ्रम में रहे। इस भ्रम को उद्धव ठाकरे ने पहले ८ घंटों में दूर कर दिया। वर्ष २०१४ में शिवसेना सत्ता में शामिल हुई। अब शिवसेना वो जल्दबाजी नहीं दिखाएगी तथा घुटने टेकने नहीं जाएगी, ऐसी नीति उन्होंने अपनाई तथा व्यर्थ चर्चा का दरवाजा बंद कर दिया। ‘शिवसेना के बगैर बहुमत होगा तो सरकार बना लो, मुख्यमंत्री बन जाओ!’ यह सीधा संदेश श्री उद्धव ठाकरे ने दिया। श्री देवेंद्र फडणवीस के लिए आज पार्टी में कोई विरोधी अथवा मुख्यमंत्री पद का दावेदार शेष नहीं है। यह एक अजीबोगरीब संयोग है। श्री गोपीनाथ मुंडे आज होते तो महाराष्ट्र का दृश्य अलग दिखा होता तथा मुंडे मुख्यमंत्री बन ही गए होते तो युति में आज जैसी कटुता नहीं दिखी होती। श्री मुंडे का निधन हो गया। एकनाथ खडसे को पहले ही हाशिए पर डालकर खत्म कर दिया गया। इसके लिए गिरीश महाजन ने इंतजाम किया। अब ‘मुक्ताई नगर’ निर्वाचन क्षेत्र से खडसे की बेटी को भी पराजित कर दिया गया। पंकजा मुंडे पराजित हो गर्इं। विनोद तावड़े को घर बैठा दिया गया तथा चंद्रकांत पाटील को मुश्किलों में डाल दिया गया। फिर भी देवेंद्र फडणवीस सरकार नहीं बना सके तथा एक-एक निर्दलीय को जमा कर रहे हैं परंतु इस गुणा-गणित से १४५ एकत्रित हो जाएंगे क्या?
ये पर्याय हैं
महाराष्ट्र में वर्तमान परिस्थितियों में क्या हो सकता है। इसे देखें-
दांव-१ : शिवसेना को छोड़कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने की हैसियत से सरकार बनाने के लिए दावा पेश कर सकती है। भाजपा के पास १०५ विधायक हैं। ४० और की जरूरत पड़ेगी। यह संभव नहीं हुआ तो विश्वासमत प्रस्ताव के दौरान सरकार धाराशायी हो जाएगी और ४० हासिल करना असंभव ही दिखता है।
दांव-२ : वर्ष २०१४ की तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देगी। राष्ट्रवादी कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में शामिल होगी, इसके बदले सुप्रिया सुले को केंद्र में तथा अजीत पवार को राज्य में पद दिया जाएगा परंतु वर्ष २०१४ में की गई भयंकर भूल श्री पवार एक बार फिर करेंगे इसकी लेशमात्र भी संभावना नहीं है। पवार को भाजपा के विरोध में सफलता मिली है और महाराष्ट्र ने उन्हें सिर पर उठाया। आज वे शिखर पर हैं। उनका यश मिट्टी में मिल जाएगा।
दांव-३ : भाजपा विश्वासमत प्रस्ताव में बहुमत सिद्ध करने में नाकाम होगी तब दूसरी बड़ी पार्टी होने के नाते शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। राष्ट्रवादी ५४, कांग्रेस ४४ तथा अन्य की मदद से बहुमत का आंकड़ा १७० तक पहुंच जाएगा। शिवसेना अपना खुद का मुख्यमंत्री बना सकेगी तथा सरकार चलाने का साहस उन्हें करना होगा। इसके लिए तीन स्वतंत्र विचारोंवाली पार्टियों को समान अथवा सामंजस्य से योजना बनाकर आगे बढ़ना होगा। अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस तरह दिल्ली में सरकार चलाई थी, उसी तरह सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। इसी में महाराष्ट्र का हित है।
दांव-४ : भारतीय जनता पार्टी तथा शिवसेना को मजबूर होकर साथ आना होगा और सरकार बनानी होगी। इसके लिए दोनों को ही चार कदम पीछे लेने पड़ेंगे। शिवसेना की मांगों पर विचार करना होगा। मुख्यमंत्री पद का विभाजन करना होगा और यही एक बेहतरीन पर्याय है परंतु अहंकार के चलते ये संभव नहीं है।
दांव-५ : ईडी, पुलिस, पैसा, धाक आदि के दम पर अन्य पार्टियों के विधायक तोड़कर भाजपा को सरकार बनानी पड़ेगी। इसके लिए ईडी के एक प्रतिनिधि को मंत्रिमंडल में शामिल करना होगा परंतु दल बदलनेवालों की क्या दशा हुई, इसे मतदाताओं ने दिखा दिया। फूट डालकर बहुमत हासिल करना, मुख्यमंत्री पद पाना आसान नहीं है। इन सबसे मोदी की छवि धूमिल होगी।
राष्ट्रपति शासन
सरकार किसी की आए फिर भी विधानसभा में विरोधियों की तोप का सामना करना मुश्किलों भरा होगा। ऐसे लोग विरोधी बेंच पर निर्वाचित हुए हैं। वर्ष २०१४ में विरोधी दल कमजोर, कम कुव्वत तथा निराश था। उन्हें सूर्यप्रकाश में भी अंधेरा दिखाई देता था तथा आत्मविश्वास पूरी तरह खो चुके थे, जिसका आज पूरी तरह उल्टा दृश्य है। जयंत पाटील, धनंजय मुंडे, पृथ्वीराज चव्हाण, अशोक चव्हाण, अजीत पवार, जितेंद्र आह्वाड सहित १०० से ज्यादा विरोधियों की फौज सरकार को रोकने के लिए खड़ी है। नौकरशाही ऐसे मौके पर उल्टे-सीधे दबाव के तहत काम नहीं करेगी और यदि कोई करेगा तो उन फाइलों की कॉपी घंटे भर में विरोधियों के हाथ में पहुंच जाएगी, ऐसा दबाव दिख रहा है। पिछली सरकारों के ‘काम’ नए विपक्ष के पाले में नहीं जाने चाहिए अन्यथा हो गया। बहुमत के लिए, सरकार बनाने के लिए लोगों को एकत्रित करना ‘मैं मुख्यमंत्री हूं, मुख्यमंत्री कुछ भी कर सकता है’ इन शब्दों का उसी पद्धति से उत्तर देनेवाला विपक्ष हाथ में तलवार लेकर तैयार है। सरकार बने तथा सरकार काम करे, ये सभी की इच्छा है लेकिन ‘हम नहीं तो कोई नहीं’ इस अहंकार के कारण सब कुछ अटक गया है। महाराष्ट्र शिवराय का है, किसी की जागीर नहीं है। हमारी सत्ता आए या न आए, महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन आएगा, ऐसा डर श्री सुधीर मुनगंटीवार दिखाते हैं। यह इसी अहंकार का हिस्सा है। राष्ट्रपति शासन लगाकर राज करना ये भाजपा की शताब्दी की सबसे बड़ी पराजय कहलाएगी। ऐसी हिमाकत एक बार करके देख ही लो।