‘परछाई’

हर सूरज की होती है अपनी परछाई
जितनी वो अपनी, उतनी ही पराई
साथ न छोड़े, ऐसी वो हरजाई
हाथ न लगे फिर भी प्रीत निभाई।

चोली दामन का साथ यह ठहरा
सदा लगाए ये मुझ पर पहरा
सच्चाई पर है झूठ की छाया
ऐसा ही है मेरा अपना साया।

धूप हो या घोर अंधेरा?
कभी न छोड़े साथ ये मेरा
जब कभी खुद को पाऊं अकेला
झट आ जाए साथी अलबेला।
नैंसी कौर नई दिल्ली।

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